FHI (ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय) और चैरिटी इंटरनेशनल हैप्पीनेस कांफ़्रेस (2007) में आमंत्रित वार्ताओं पर आधारित पाठ

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उन्मूलनवादी परियोजना

 

प्रस्तावना

यह वार्ता पीड़ा और उससे छुटकारा प्राप्त करने के तरीकों के बारे में है।
मेरी भविष्यवाणी है कि हम दुनिया भर में सजीव जगत से पीड़ा समाप्त कर देंगे।
हमारे वंशज आनुवंशिक रूप से पहले से ही प्रोग्राम किए गए उस कल्याण के अनुक्रम (ग्रेडिएंट) से जीवंत होंगे, जो आज के चरम अनुभवों से कई गुना अधिक समृद्ध होंगे।

सबसे पहले, मैं यह रूपरेखा दूँगा कि किसी भी प्रकार के अप्रिय अनुभव - मनोवैज्ञानिक दर्द और साथ ही शारीरिक दर्द - के जैविक अवशेष का उन्मूलन करना तकनीकी रूप से क्यों संभव है।
दूसरे, मैं उन्मूलनवादी परियोजना की अधिभावी नैतिक आवश्यकता के लिए तर्क दूँगा, चाहे कोई किसी तरह का नैतिक उपयोगितावादी हो या न हो।
तीसरे, मैं इसके लिए तर्क दूँगा कि जैव-प्रौद्योगिकी में क्रांति का मतलब यह क्यों है कि यह सचमुच होकर रहेगा, हालाँकि लगभग उतनी तेज़ी से नहीं जितनी तेज़ी से होना चाहिए।

1: यह तकनीकी दृष्टि से क्यों संभव है

दुर्भाग्य से, जो पीड़ा का उन्मूलन नहीं करेगा, या कम-से-कम अपने आप नहीं करेगा, वह है सामाजिक-आर्थिक सुधार, या अत्यधिक आर्थिक विकास, या सामान्य अर्थों में प्रौद्योगिकीय प्रगति, या दुनिया की बुराइयों को दूर करने के लिए कोई भी पारंपरिक रामबाण। बाहरी वातावरण में सुधार करना सराहनीय और महत्वपूर्ण है; लेकिन ऐसा सुधार हमारी सुख-विषयक ट्रेडमिल को आनुवंशिक रूप से बाधित सीमा से अधिक व्यवस्थित नहीं कर सकता। दो अध्ययनों ने पुष्टि की है कि कल्याण - या अ-कल्याण - का [आंशिक रूप से] दाययोग्य निर्धारित-बिंदु होता है और हम अपने जीवन-काल के दौरान उसके चारों ओर डूबते-उतराते रहते हैं। अलग-अलग व्यक्तियों में यह निर्धारित-बिंदु भिन्न-भिन्न होता है। [लंबी अवधि के अनियंत्रित तनाव को लागू करके अपने सुख-विषयक निर्धारित-बिंदु को कम करना संभव है; लेकिन यह पुनः निर्धारण भी उतना आसान नहीं है जितना यह लगता है: युद्ध के समय में आत्महत्या की दरें आम तौर पर नीचे चली जाती हैं; और, अध्ययन1 बताते हैं कि पंगु करने वाली दुर्घटना के छह महीने बाद हम विपत्तिपूर्ण घटना से पहले की तुलना में आम तौर पर न तो अधिक दुखी होते हैं और न कम।] दुर्भाग्य से, आदर्श समाज का निर्माण करने के प्रयास इस जैविक सीमा को पार नहीं कर सकते, चाहे वाम या दक्षिण पक्षों के रामराज हो, मुक्त बाज़ार या समाजवाद हो, धर्म या धर्मनिरपेक्षता हो, भविष्योन्मुखी उच्च-तकनीक या बस अपने बग़ीचे में खेती करना हो। चाहे वह सब कुछ पूरा हो जाए जिसे परंपरागत भविष्यवादियों ने चाहा है - अनन्त यौवन, असीमित भौतिक संपत्ति, आकृति-विज्ञान संबंधी स्वतंत्रता, श्रेष्ठतम मेधा, समज्जन वी.आर., आणविक नैनो-प्रौद्योगिकी, आदि लेकिन इस बात का कोई सबूत नहीं है कि पुरस्कार मार्ग संवर्धन के अभाव में हमारे जीवन की व्यक्तिपरक गुणवत्ता हमारे शिकारी-संग्राहक पूर्वजों या आज के नव-गिनी जनजाति व्यक्ति - के जीवन की गुणवत्ता को औसतन उल्लेखनीय रूप से पार कर जाएगी। परिष्कृत स्नायु-स्कैनिंग के अभाव में इस दावे को साबित करना मुश्किल है; लेकिन मनोवैज्ञानिक हताशा के वस्तुपरक संकेत, जैसे आत्महत्या की दरें, इसमें मदद करते हैं। प्रवर्धित मानव अभी भी, भयानक पीड़ा से क्षुद्र निराशाओं और कुंठाओं की श्रेणी - दुख, चिंता, ईर्ष्या, अस्तित्व-संबंधी परेशानी - के डार्विनवादी भावनाओं के परिदृश्य का शिकार होंगे। उनका जीवविज्ञान "मानव होने का क्या अर्थ है" का हिस्सा है। चेतना की विषयनिष्ठ अप्रिय स्थिति मौजूद है क्योंकि वे आनुवंशिक रूप से अनुकूल-योग्य थे। हमारी प्रत्येक मूल भावना में हमारे विकासवादी अतीत में संकेत करने की विशिष्ट भूमिका थी: उनमें ऐसे व्यवहारों को बढ़ावा देने की प्रवृत्ति थी जिन्होंने पुश्तैनी वातावरण में हमारे जीनों की समावेशी उपयुक्तता को बढ़ाया।

इसलिए अगर केवल हमारे बाहरी वातावरण में जोड़-तोड़ करने से पीड़ा और बेचैनी कभी ख़त्म नहीं हो सकती, तो तकनीकी तौर पर क्या काम करता है?

यहाँ आरोही क्रम में समाजशास्त्रीय संभावना के तीन परिदृश्य दिए गए हैं:

क) वायर-हेडिंग (इलेक्ट्रॉनिक मस्तिष्क प्रतिरोपित व्यक्ति)
ख) रामबाण डिज़ाइनर औषध
ग) आनुवंशिक इंजीनियरी और मैं ध्यान केंद्रित करना चाहता हूँ - डिज़ाइनर बच्चों (जिन बच्चों को मनचाहा रूप देने के लिए उनके डीएनए में परिवर्तन किया गया है) की आसन्न प्रजनन क्रांति

क) स्मरण करें वायर-हेडिंग प्रतिरोपित इलेक्ट्रॉड के माध्यम से मस्तिष्क के आनंद केंद्रों के प्रत्यक्ष उत्प्रेरण है। अंतरा-कपालीय आत्म-उत्प्रेरण किसी तरह की शारीरिक या व्यक्तिपरक सहिष्णुता नहीं दिखाता अर्थात यह दो दिनों के बाद उतना ही परितोष-जनक है जितना कि दो मिनट के बाद। वायर-हेडिंग दूसरों को नुकसान नहीं पहुँचाती; इसका पारिस्थितिकी अवशेष छोटा होता है; यह मनोवैज्ञानिक और शारीरिक दर्द समाप्त कर देती है; और संभवतः मानव गरिमा के लिए यह संभोग करने की तुलना में बहुत कम अपमानजनक है। वैसे, आजीवन वायर-हेडिंग गंभीर अवसाद-ग्रस्त थोड़े-से लोगों के लिए ही आकर्षक संभावना लगती है। लेकिन इसे अपनाने के ख़िलाफ़ तकनीकी तर्क क्या हैं?

देखिए, वायर-हेडिंग विकासपरक रूप से स्थायी हल नहीं है: इसे व्यापक रूप से अपनाने के ख़िलाफ़ चयन का दबाव होगा। वायर-हेडिंग व्यवहार-पोषण को बढ़ावा नहीं देती: वायर-हेड, चाहे मानव या गैर-मानव, शिशु वायर-हेड का पालन-पोषण नहीं करना चाहते। वायर-हेडिंग के वेश में एकसमान, भेदभाव-रहित परमानंद या इसका समकक्ष मानव प्रयोग को, कम-से-कम इसके विश्व स्तर पर अपनाए जाने पर, प्रभावी रूप से समाप्त कर देगा। पारितोषिक केंद्रों का प्रत्यक्ष स्नायु-उत्प्रेरण सूचनापरक संवेदनशीलता से पर्यावरण-संबंधी उत्प्रेरण को नष्ट कर देता है। तो यह मानते हुए कि हम चुस्त होना चाहते है - और अति-चुस्त हो जाते हैं तो हमारे पास विकल्प है। बुद्धिमान एजेंटों की आज की कुछ आजीवन अवसादपूर्ण विशेषताओं की रोगी प्रवृत्तियों पर आधारित अभिप्रेरक संरचना हो सकती है। या बुद्धिमान एजेंटों के पास हमारे वर्तमान आनंद और दर्द का विशिष्ट मिश्रण हो सकता है। या वैकल्पिक रूप से, हम पूरी तरह से मस्तिष्क-संबंधी परमानंद की [अनुकूलित] प्रवृत्तियों के आधार पर मन की सूचनापरक अर्थव्यवस्था रख सकते हैं जिसके लिए मैं तर्क दूँगा।

दरअसल, वायर-हेडिंग की यह बर्खास्तगी बहुत जल्दबाज़ी की बात हो सकती है। सुदूर भविष्य में, इस बात की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता कि जो भी अप्रिय या एकरस है उसे अजैविक सुपरकंप्यूटरों, प्रोस्थीसिस या रोबोटों पर डाल दिया जाए जबकि हम एकसमान कामपरक परमानंद का सुख लें। या शायद कामपरक परमानंद नहीं, बल्कि संभवतः आदर्श स्थितियों का कोई अन्य समूह जिसमें बस सुधार नहीं किया जा सका। लेकिन वह अटकल पर आधारित है। हमारा अंतिम गंतव्य जो भी हो, लेकिन मैं सोचता हूँ कि परमानंद और सर्वश्रेष्ठ मेधा दोनों का लक्ष्य किया जाना अधिक विवेकपूर्ण होगा - कम-से-कम तब तक के लिए जब तक हम उसके पूरे निहितार्थ समझ सकें जो हम कर रहे हैं। पीड़ा समाप्त करने के लिए जिस तरह की नैतिक तात्कालिता है, उसी तरह की तात्कालिक आवश्यकता परमानंद की अनुभूति को अधिकतम करने के संबंध में नहीं है।

[इस पर ध्यान देना उपयोगी होगा कि बोझ उतारने का विकल्प यह मानता है कि अजैविक कंप्यूटर, प्रोस्थीसिस और रोबोट अभूतपूर्व व्यक्तिपरक दर्द का अनुभव नहीं करते - या कम-से-कम उन्हें यह करने की ज़रूरत नहीं है - चाहे अपनी कार्यात्मक संरचना के आधार पर वे हानिकारक उत्प्रेरण की उपेक्षा या प्रत्युत्तर दे सकते हों। मौजूदा कंप्यूटरों के साथ अजैविक पीड़ा का यह अभाव अपेक्षाकृत विवादहीन है अपना पीसी बंद करने के नैतिक निहितार्थ नहीं होते, और सिलिकन रोबोट को क्षतिग्रस्त होने की स्थिति में दर्द महसूस किए बिना संक्षारक अम्ल की उपेक्षा करने के लिए प्रोग्राम किया जा सकता है। यह बहस का विषय है कि क्या शास्त्रीय वॉन न्युमान्न संरचना के साथ कोई गणना-संबंधी प्रणाली कभी चित्तरंजक ढंग से सचेत हो सकेगी। मुझे इसमें संदेह है; लेकिन दोनों स्थितियों में, इससे बोझ उतारने का विकल्प प्रभावित नहीं होता, जब तक कि कोई इस पर बहस न करे कि किसी भी प्रणाली हेतु हानिकारक उत्प्रेरण से बचने के लिए पीड़ा की व्यक्तिपरक बुनावट कार्यात्मक रूप से अनिवार्य है]

ख) पीड़ा-उन्मूलन के लिए दूसरा तकनीकी विकल्प भविष्योन्मुखी डिज़ाइनर औषध है। परिपक्व जीनोमिक के बाद की दवा के युग में, क्या तार्किक रूप से सही मायने में आदर्श आनंद-औषध डिज़ाइन करना संभव होगा जो अस्वीकार्य दुष्प्रभावों के बिना आजीवन उच्च-संचालित कल्याण पेश कर सके? "आदर्श आनंद-औषध" यहाँ बस एक संक्षिप्ति है। सिद्धांत रूप में इस तरह की दवा मानसिक, एकानुभूति-परक, सौंदर्य-परक और शायद आध्यात्मिक कल्याण को न कि सिर्फ़ सामान्य उत्तेजक एक-आयामी और अनैतिक अर्थ में आनंद को - शामिल कर सकती है।
हम यहाँ मनोरंजक ख़ुशी लाने वाले औषध की बात नहीं कर रहे, जो केवल मस्तिष्क के नकारात्मक प्रतिक्रिया-तंत्र को सक्रिय करते हैं; ही साहसिक नई दुनिया की उथली, नींदमय संतुष्टि की; और न ऐसी दवाओं की जो अपने अनियंत्रित रोमांच, महत्वपूर्ण अंतर्दृष्टि, भव्यता और विचारों की उड़ान की हानि के कारण ख़ुशी का उन्माद प्रेरित करती हैं। क्या हम सही मायनों में ऐसी चमत्कारपूर्ण औषध विकसित कर सकते हैं जो सभी के लिए उच्च गुणवत्ता का जीवन सुनिश्चित करने के लिए स्थायी आधार पर सुख-विषयक ट्रेडमिल को पुनः व्यवस्थित करके मोहक कल्याण पेश करे।

बहुत सारे लोग "औषध" शब्द से बिदकते हैं - जो आज के सड़क-छाप हानिकारक औषध और उनके बेजान चिकित्सीय समकक्षों के आधार पर समझ में आता है। इसके बावजूद हमारे समाज में शिक्षाविद और बुद्धिजीवी आम तौर पर आदर्श व्यर्थ, एथिल अल्कोहल लेते हैं। यदि ऐसी औषध लेना सामाजिक रूप से स्वीकार्य हो जो आपको अस्थायी तौर पर ख़ुश और बेवक़ूफ़ बना दे, तो युक्तिसंगत ढंग से ऐसी औषध डिज़ाइन क्यों न की जाए, जो लोगों को सदा के लिए ज़्यादा ख़ुश और चुस्त बना दे? अनुमानतः, दुरुपयोग की संभावना को सीमित करने के लिए, यह तय किया जा सकता है कि कोई आदर्श आनंद-औषध एक सीमित लेकिन महत्वपूर्ण अर्थ में निकोटीन के समान हो जहाँ धूम्रपान करने वाले व्यक्ति का मस्तिष्क सूक्ष्म रूप से अपने इष्टतम स्तर को व्यवस्थित करता है: कोई अनियंत्रित खुराक-वृद्धि नहीं है।

निश्चित रूप से औषध पर आधारित समाधानों में सभी प्रकार की कमियाँ हैं। तकनीकी तौर पर, मैं सोचता हूँ कि इन कमियों को दूर किया जा सकता है, यद्यपि मैं इसे यहाँ दिखाने की कोशिश नहीं करूँगा। लेकिन इसके और गहरे मुद्दे हैं। अगर विकास से हासिल हमारी मौजूदा प्राकृतिक चेतना की स्थिति में कुछ मौलिक रूप से ग़लत नहीं है - या कम-से-कम मौलिक रूप से न्यून नहीं है - तो हम इसे बदलने के लिए इतने उत्सुक नहीं होंगे। यहाँ तक कि जब यह अप्रिय नहीं होती, तो भी रोज़ाना की चेतना उसकी तुलना में साधारण होती है जिसे हम चरम अनुभव कहते हैं। रोज़ाना की साधारण चेतना अनुमानतः इस अर्थ में अनुकूलनीय थी कि यह हमारे जीन को अफ़्रीक़ी सवाना पर अपनी अधिक प्रतियाँ छोड़ने में मदद करती थी; लेकिन इसे अनिश्चित काल के लिए अपनी प्राथमिक स्थिति क्यों रखा जाए? अपने आनुवंशिक कोड में सुधार के द्वारा मानव स्वभाव को सचमुच क्यों न बदल दिया जाए?

पुनः, औषधीय समाधानों की यह बर्खास्तगी भी जल्दबाज़ी की बात हो सकती है। तार्किक रूप से, रामबाण डिज़ाइनर औषध हमेशा चेतना के सूक्ष्म-निर्मित और तत्काल विपर्यय-योग्य नियंत्रण के लिए उपयोगी हो सकते हैं; और मैं सोचता हूँ कि सचेत मन की मुख़्तलिफ़ क़िस्मों का पता लगाने के लिए डिज़ाइनर औषध अनिवार्य उपकरण होगा। लेकिन खुद को हमेशा औषध की ज़रूरत के साथ रखने के बजाय क्या यह बेहतर नहीं होता कि हम सब मनोवैज्ञानिक सर्वश्रेष्ठ स्वास्थ्य की आनुवंशिक प्रवृत्ति के साथ पैदा होते? क्या सबसे उत्साही उन्मूलनवादी भी जन्म से ही सभी बच्चों को औषध की कॉकटेल देने; और फिर अपने बाकी जीवन में ऐसा औषध कॉकटेल लेने का प्रस्ताव करता है?

ग) तो तीसरे, ऐसे आनुवंशिक समाधान हैं, जो शारीरिक और जर्मलाइन दोनों इलाज अपनाते हैं।
संदर्भ के रूप में, आज ऐसे बहुत कम लोग हैं जो हमेशा उदास या निराश रहते हैं, चाहे उसका स्तर विविध हो। एकल- और द्वि- जुड़वाँ के साथ अध्ययनों ने पुष्टि की है कि अवसाद के लिए आनुवंशिक लदान का उच्च स्तर है। इसके विपरीत, कुछ लोग हैं जो प्रवृत्ति से आशावादी हैं। आशावादियों के अलावा, बहुत छोटी संख्या में ऐसे लोग हैं जिन्हें मनोचिकित्सक अति-सक्रिय कहते हैं। अति-सक्रिय लोग उन्मत्त या द्विध्रुवी नहीं हैं; लेकिन समकालीन मानकों के अनुसार, वे हमेशा अत्यधिक ख़ुश होते हैं, यद्यपि कभी-कभी दूसरों से ज़्यादा ख़ुश होते हैं। अति-सक्रिय लोग अपने परिवेश के प्रति "उचित रूप से" और अनुकूलित रूप से प्रतिक्रिया करते हैं। वास्तव में वे चारित्रिक रूप से ऊर्जावान, उत्पादक, और रचनात्मक होते हैं। यहाँ तक कि जब वे आनंदमय होते हैं, तो भी वे "आनंद से बाहर" नहीं होते।

अब अगर, पूरी सभ्यता के रूप में, पूरी तरह से कल्याण की अनुकूलनीय प्रवृत्तियों द्वारा संचालित प्रेरक प्रणाली अपनाने के लिए हमें आनुवंशिक रूप से अति-सक्रिय बनना चुनना हो, तो क्या होगा? अधिक क्रांतिकारी रूप से, जैसे कि सुख-विषयक सुर का आनुवंशिक आधार समझा जाता है, क्या हम - मनो-संतुलन और सुख-विषयक ट्रेडमिल समाप्त किए बिना अपने सुख-विषयक निर्धारित-बिंदु को विस्तृत उच्च स्तरों तक स्थानांतरित करके - अति-सक्रियता का प्रवर्धन करने वाले जीन/जीन-स्वरूप संयोजन और उनके नियामक प्रवर्धकों की अनेक अतिरिक्त प्रतियाँ जोड़ना चुनें।

यहाँ तीन बिंदु हैं:
पहले, यह आनुवंशिक पुनर्व्यवस्था अन्य प्रकार की एकरूपता का समर्थन करती प्रतीत हो सकती है; लेकिन यह याद करना उपयोगी होगा कि ज़्यादा ख़ुश लोग - और खासकर हाइपर-डोपामाइनर्जिक लोग आम तौर से अवसादग्रस्तता की तुलना में संभावित रूप से परितोष-जनक उत्प्रेरण की व्यापक श्रेणी के प्रति प्रतिक्रियाशील होते हैं: वे अधिक अन्वेषणात्मक व्यवहार में संलग्न होते हैं। इससे प्रवर्धित व्यक्ति और मानव-पश्चात समाज दोनों के लिए, उप-इष्टतम स्थान में अटक जाने की संभावना कम हो जाती है।

दूसरे, सार्वभौमिक अति-सक्रियता विशाल प्रयोग की तरह लग सकती है; और एक अर्थ में यह है भी। लेकिन सभी यौन-प्रजनन प्रयोग हैं। हम आनुवंशिक चौपड़ खेलते हैं, अपने जीन हिलाते हैं और फिर आनुवंशिक पासा फेंकते हैं। हममें से अधिकतर "शुद्ध जाति" शब्द पर ठिठकते हैं; लेकिन जब हम अपने भावी साथी चुनते हैं, तो प्रभावी रूप से हम, अपरिष्कृत और अयोग्य रूप से, यही व्यवहार करते हैं। अंतर यह है कि अगले कुछ दशकों के भीतर, भावी माता-पिता अपने प्रजनन-संबंधी फ़ैसलों में उत्तरोत्तर अधिक युक्तिसंगत और ज़िम्मेदार ढंग से कार्रवाई करने में सक्षम हो सकेंगे। पूर्व-प्रत्यारोपण निदान नेमी बन जाएगा, कृत्रिम कोख हमें मानवीय जन्म-मार्ग की बाधाओं से मुक्ति दिला देगी; और प्रजनन औषध में क्रांति डार्विनवादी पुरानी लॉटरी का स्थान लेने लगेगी। सवाल यह नहीं है कि क्या प्रजनन क्रांति आ रही है, बल्कि यह है कि हम किस प्रकार के व्यक्ति - और किस प्रकार की चेतना की रचना करना चाहते हैं?

तीसरे, क्या यह प्रजनन क्रांति पश्चिम में समृद्ध श्रेष्ठजनों का परमाधिकार होने वाला नहीं है? शायद लंबे समय के लिए नहीं। उदाहरण के लिए, मोबाइल फ़ोन की शुरुआत और दुनिया भर में उन्हें अपनाए जाने के बीच संक्षिप्त अंतराल की तुलना रेडियो की शुरुआत और दुनिया भर में उसे अपनाए जाने के बीच 50 वर्ष के अंतराल के साथ; तथा टेलीविज़न की शुरुआत और दुनिया भर में उसके प्रवेश के बीच 20 वर्ष के अंतराल के साथ करें। नई प्रौद्योगिकियों की शुरुआत और उनकी वैश्विक स्वीकृति के बीच अंतराल तेज़ी से कम हो रहा है। और यह बात क़ीमत के बारे में भी सच है।

जो भी हो, सुख-विषयक ट्रेडमिल को एकदम समाप्त कर देने के बजाय आनुवंशिक रूप से पुनः व्यवस्थित करने के लाभों में से एक, कम-से-कम संभावित भविष्य में, यह है कि दर्द, आशंका, अपराध-बोध और यहाँ तक कि अवसाद की कार्यात्मक सादृश्यता को उनके उस भयंकर कच्चे अनुभव के बिना संरक्षित किया जा सकता है जैसा कि आज हम समझते हैं। हम असंतोष की कार्यात्मक सादृश्यता को बनाए रख सकते हैं - जो संभवतः प्रगति की मोटर है तथा विवेक और महत्वपूर्ण अंतर्दृष्टि को बनाए रख सकते हैं जिनमें उल्लासमय उन्माद नहीं होता। चाहे सुख-विषयक सुर को व्यापक रूप से बढ़ाया जाए, और चाहे हमारे परितोष-केंद्रों को शारीरिक और कार्यात्मक रूप से विस्तारित किया जाए, तब भी सैद्धांतिक रूप में मौजूदा वरीयता संरचना के काफ़ी हिस्से को संरक्षित करना संभव है। यदि आप बीथोवेन के बजाय मोज़ार्ट पसंद करते हैं, या दर्शन के बजाय पुशपिन पसंद करते हैं, तो भी आप इस वरीयता के दर्जे को बनाए रख सकते हैं चाहे आपका सुख-विषयक सुर बेहद समृद्ध हो।

अब निजी तौर पर, मैं सोचता हूँ कि अगर हमारी वरीयता संरचना को आमूलचूल बदल दिया जाए, तो यह बेहतर होगा, और हम [कृपया विशिष्ट प्रयोग के लिए क्षमा करें] "भावना के री-एंसेफ़ालिसेशन" का अनुसरण करें। प्राकृतिक चयन के माध्यम से विकास ने हममें सभी तरह की अकार्यात्मक वरीयताएँ बनाने की मज़बूत प्रवृत्ति छोड़ दी है जो खुद हमें और दूसरों दोनों को नुक़सान पहुँचाती है और इससे हमारी जीन को लाभ मिलता है। चंगेज़ खान को स्मरण करें: "सबसे बड़ी ख़ुशी है अपने दुश्मन को तबाह करना, उसे अपने सामने घसीट लाना, यह देखना कि उसके शहर राख में बदल गए हैं, यह देखना कि उसे प्यार करने वाले आँसुओं में डूब गए हैं, और उसकी पत्नियों और बेटियों को अपनी बाँहों में ले आना।"

अब मुझे बताया गया है कि शिक्षा-जगत इतना ज़्यादा ख़राब नहीं है, लेकिन विश्वविद्यालय जीवन के भी अपनी तरह के शीलवान वहशीपन के रूप हैं इसकी प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति की माँग और अल्फ़ा-पुरुष प्रभुत्व की रस्में: शून्य-राशि खेल जिसमें अनेक हारे हुए हैं। हमारी बहुत सारी वरीयताएँ ख़राब व्यवहार और दिमाग़ी स्थिति प्रतिबिंबित करती हैं जो पैतृक वातावरण में आनुवंशिक रूप से अनुकूलनीय थीं। इसके बजाय, क्या यह बेहतर नहीं होता कि हम अपने खुद के भ्रष्ट कोड फिर से लिखते? मैंने यहाँ आनुवंशिक रूप से सुख-विषयक सुर बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित किया है। फिर भी भावना के जीव-विज्ञान में महारत का मतलब है कि हम, उदाहरण के लिए, अपनी समानुभूति के लिए क्षमता में विस्तार कर सकेंगे, और विश्वास और सामाजिक होने की क्षमता को बढ़ावा देने के लिए कार्यात्मक रूप से दर्पण न्यूरॉन्स का विस्तार कर सकेंगे और ऑक्सीटोसिन छोड़े जाने की निरंतर वृद्धि बना सकेंगे। इसी तरह, हम, उदाहरण के लिए, आध्यात्मिकता, अपने सौंदर्य-बोध, या अपने हास्य-बोध के आणविक चिह्नों की पहचान कर सकते हैं और उनकी मनोवैज्ञानिक मशीनरी को व्यवस्थित और "अति-व्यक्त" भी कर सकते हैं। सूचना-सैद्धांतिक दृष्टिकोण की तुलना में, विश्व के प्रति अनुकूलनीय, लचीली, और बुद्धिमत्तापूर्ण प्रतिक्रिया के लिए जो महत्वपूर्ण है, वह सुख-विषयक पैमाने पर हमारा निरपेक्ष बिंदु नहीं है, बल्कि यह है कि हम भिन्नताओं पर सूचनात्मक दृष्टि से संवेदनशील हों। निश्चित रूप से सूचना सिद्धांत-निर्माता कभी-कभी सूचना को बस "वह अंतर जो अंतर लाए" के रूप में परिभाषित करते हैं।

तथापि, फिर से बल देने के लिए, भावनाओं का यह री-एंसेफ़ालिसेशन वैकल्पिक है। सभी चैतन्य का कल्याण निर्मित करना और हमारी ज़्यादातर लेकिन सब नहीं, मौजूदा वरीयता संरचना को बनाए रखना तकनीकी रूप से संभव है। मैंने पीड़ा समाप्त करने के लिए जो तीन तकनीकी विकल्प प्रस्तुत किए हैं - वायर-हेडिंग, डिज़ाइनर औषध और आनुवंशिक इंजीनियरिंग वे परस्पर अनन्य नहीं हैं। क्या वे संपूर्ण हैं? मुझे किसी अन्य व्यवहार्य विकल्प का पता नहीं है। कुछ मानव-प्रवर्धन-वादियों का विश्वास है कि एक दिन हम पूरी तरह से अजैविक कंप्यूटर में स्कैन, अंकीय और अपलोड तथा पुनः प्रोग्राम किए जा सकेंगे। देखिए, शायद, मुझे संदेह है; लेकिन फिर भी, यह प्रस्ताव मौजूदा जैविक जीवन की पीड़ा का हल नहीं करता जब तक कि हम तथाकथित विनाशकारी अपलोडिंग को न अपना लें जो ऐसा प्रलयकारी विकल्प है जिस पर मैं यहाँ विचार तक नहीं करूँगा।

2: यह क्यों होना चाहिए

मान लें कि अगली कुछ शताब्दियों में हम अपनी भावनाओं पर ये ईश्वर-सदृश शक्तियाँ प्राप्त कर लेंगे। यह भी मान लें कि अप्रिय अनुभव के संकेत प्रकार्य को या तो पुनः व्यवस्था जिसके बारे में यहाँ तर्क दिए गए हैं, या सब कुछ अप्रिय या नेमी का बोझा अजैविक प्रोस्थीसिस, बायोनिक आरोपण या अजैविक कंप्यूटरों पर उतार दिए जाने के माध्यम से या शायद ईर्ष्या की तरह की किसी चीज़ के मामले में एकबारगी उन्मूलन के माध्यम से बदला जा सकता है। हम सब उन्मूलनवादी क्यों हों?

यदि कोई शास्त्रीय उपयोगितावादी है, तो उन्मूलनवादी परियोजना आती है: यह बेन्थम और जैव-प्रौद्योगिकी है। पीड़ा के उन्मूलन के समर्थन के लिए व्यक्ति का शास्त्रीय उपयोगितावादी होना ज़रूरी नहीं है; लेकिन सभी शास्त्रीय उपयोगितावादी को उन्मूलनवादी परियोजना अपनानी चाहिए। बेन्थम ने सामाजिक और वैधानिक सुधार पर महारत हासिल की थी, जो अपने आप में महान है; लेकिन वे जैव-प्रौद्योगिकी और आनुवंशिक चिकित्सा के युग से पहले काम कर रहे थे।

यदि कोई वैज्ञानिक दृष्टि से प्रबुद्ध बौद्ध है, तो भी उन्मूलनवादी परियोजना आती है. विश्व के धर्मों के बीच बौद्ध, अनन्य रूप से, जीव-जगत में पीड़ा की प्रधानता पर ध्यान केंद्रित करते हैं। बौद्ध यह सोच सकते हैं कि आनुवंशिक इंजीनियरिंग की तुलना में आठ-सूत्री आदर्श पथ निर्वाण तक निश्चित मार्ग पेश करता है; लेकिन अगर जैव प्रौद्योगिकी काम करती है, तो बौद्ध के लिए सिद्धांत रूप में उसके विरुद्ध तर्क देना मुश्किल होगा। बौद्ध इच्छा के विलोप के माध्यम से पीड़ा में राहत पर ध्यान देते हैं; लेकिन फिर भी इस बात पर ध्यान देना उपयोगी होगा कि विलोप तकनीकी रूप से वैकल्पिक है, और यह शायद तार्किक रूप से, समाज को स्थिरता की ओर ले जाए। इसके बजाय पीड़ा की समाप्ति और इच्छाओं के सारे तरीके जारी रखना दोनों संभव हैं।

इस्लाम और जुडेओ-ईसाई परंपरा के अनुयायियों को मनाना चुनौती जैसा है। लेकिन - अनुभवजन्य साक्ष्य में विसंगतियों के बावजूद - आस्तिकों का दावा है कि अल्लाह/ईश्वर अनंत रूप में कृपालु और दयालु है। इसलिए अगर मात्र नश्वर तक सभी चैतन्य के कल्याण की कल्पना कर सकते हैं, तो यह दावा करना तिरस्कारपूर्ण होगा कि ईश्वर अपनी दया के दायरे में सीमित है।

अधिकतर समकालीन दार्शनिक शास्त्रीय उपयोगितावादी या बौद्ध या आस्तिक नहीं हैं। तो, उदाहरण के लिए, नैतिक शुद्धतावादी को उन्मूलनवादी परियोजना को गंभीरता से क्यों लेना चाहिए?
यहाँ मैं अपने पाठ के रूप में शेक्सपीयर की ये पंक्तियाँ लेना चाहता हूँ

"क्योंकि अभी तक वहाँ कभी कोई दार्शनिक नहीं था
जो दाँत के दर्द को धैर्यपूर्वक सह सके"
[
मच एडो अबाउट नथिंग, दृश्य पाँच, अंक एक (लेओनाटो बोल रहा है)

जब कोई कष्टदायी शारीरिक दर्द से पीड़ित होता है, तो उसे इस बात से हमेशा आघात लगता है कि यह कितना भयावह हो सकता है।
यह मान लेना लुभावना है कि शुद्ध रूप से "मनोवैज्ञानिक" दर्द - अकेलापन, अस्वीकृति, अस्तित्व-संबंधी आशंका, दुख, आशंका, अवसाद - शारीरिक दर्द की तरह चरम क्रूर नहीं हो सकते; लेकिन फिर भी दुनिया में हर साल 800,000 से अधिक लोगों द्वारा अपना जीवन समाप्त करने का कारण मुख्य रूप से मनोवैज्ञानिक निराशा है। ऐसा नहीं है कि अन्य चीज़ें - महान कला, दोस्ती, सामाजिक न्याय, हास्य की भावना, चरित्र की उत्कृष्टता उत्पन्न करना, शैक्षणिक विद्वत्ता, आदि - मूल्यवान नहीं हैं; लेकिन जब - या तो खुद के या अपने प्रिय के जीवन में गहन शारीरिक या मानसिक निराशा आती है तो हम पहचानते हैं कि यह तीव्र दर्द तत्काल प्राथमिकता है और तात्कालिकता है। यदि आप अपना हाथ दरवाज़े में आ जाने के दर्द में उलझे हैं, तो आप उस व्यक्ति को थोड़ा पापी बना देंगे जो आपको जीवन में महीन चीज़ें याद करने का आग्रह कर रहा है। यदि आप एक दुखद प्रेम प्रसंग के बाद व्याकुल हों, तो आप नहीं चाहेंगे कि आपको असंवेदनशील ढंग से बताया जाए कि बाहर खूबसूरत दिन है।

ठीक है, जब तक अत्यधिक दर्द या मनोवैज्ञानिक निराशा रहती है, तब तक इसकी तात्कालिकता और प्राथमिकता रहती है जो व्यक्ति के जीवन की शेष परियोजनाओं को अधिरोहित कर देती है; लेकिन उससे क्या? जब कष्ट गुजर जाता है, तो हम फिर अपने जीवन में पहले की तरह क्यों नहीं लौट जाते?
देखिए, प्राकृतिक विज्ञान "कहीं नहीं से दृश्य", धारणापूर्ण ईश्वर की दृष्टि से दृश्य के लिए इच्छा करता है। भौतिकी बताती है कि किसी यहाँ-और-अब का किसी अन्य से अधिक विशेषाधिकार नहीं है; सभी समान रूप से वास्तविक हैं। विज्ञान और प्रौद्योगिकी हमें इस ईश्वर-सदृश परिप्रेक्ष्य से मिलान के लिए शीघ्र ही पूरे जीव-जगत पर ईश्वर-सदृश शक्तियाँ देने वाले हैं। मेरा तर्क है कि जब तक कोई ऐसा चैतन्य है जो हमारी निराशा के समान पीड़ा भोग रहा है, तो उस पीड़ा को उसी प्राथमिकता और तात्कालिकता से सँभाला जाना चाहिए जैसे कि वह हमारा खुद का दर्द हो या हमारे किसी प्रिय का। सत्ता के साथ ज़िम्मेदारी आती है। ईश्वर-सदृश शक्तियों की ईश्वर-सदृश ज़िम्मेदारियाँ होती हैं। इस तरह, उदाहरण के लिए, 200 साल पहले की पीड़ा की स्थिति वास्तव में भयानक रही होगी; लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि इस तरह की पीड़ा को विवेकपूर्वक "अनैतिक" कहा जा सकता है - क्योंकि तब ऐसा बहुत अधिक नहीं था जो इसके बारे में किया जा सकता हो। लेकिन जैव-प्रौद्योगिकी को धन्यवाद है कि अब यह है - या शीघ्र ही होगा। अगली कुछ शताब्दियों में, किसी भी तरह की पीड़ा वैकल्पिक बनने जा रही है।

यदि आप शास्त्रीय नैतिक उपयोगितावादी नहीं है, तो मात्र परमानंद को अधिकतम करने के बजाय सुख-विषयक ट्रेडमिल को पुनः व्यवस्थित करने का लाभ यह है कि आप हमारी मौजूदा वरीयता संरचना का कम-से-कम एक पहचान-योग्य वंशज कायम रख रहे हैं। सुख-विषयक ट्रेडमिल की पुनः व्यवस्था को आपकी मौजूदा मूल्य-योजना के अनुरूप बनाया जा सकता है। इसलिए ख़राब नाम के "वरीयता उपयोगितावादी" को भी समायोजित किया जा सकता है। निश्चित रूप से भावनाओं पर नियंत्रण का अर्थ है कि आप अपनी मौजूदा जीवन परियोजनाओं का अधिक प्रभावी ढंग से अनुसरण कर सकते हैं।
और पीड़ा के तथाकथित चरित्र-निर्माण प्रकार्य का क्या होगा? "वह जो मुझे नहीं कुचलता, मुझे मज़बूत बनाता है", नीत्शे ने कहा था। यह चिंता ग़लत लगती है। अन्य बातें समान रहने पर, सुख-विषयक सुर बढ़ाने से अभिप्रेरणा मज़बूत होती है - यह हमें मनोवैज्ञानिक तौर पर अधिक मज़बूत बनाता है। व्यतिरेक से, लंबे समय तक निराश मन सीखी गई बेबसी और व्यवहारपरक निराशा के संलक्षण की ओर ले जाता है।

मैंने स्पष्ट रूप से मूल्य क्रांतिकारियों को संबोधित नहीं किया विषयवादी या नैतिक संदेहवादी जो कहते हैं कि सभी मूल्य बस राय का विषय हैं, और यह कि तार्किक रूप से कोई "चाहिए" से "है" हासिल नहीं कर सकता।
अच्छा, मान लीजिए कि मुझे दर्द महसूस होता है क्योंकि मेरा हाथ गरम स्टोव पर है। यह दर्द आंतरिक रूप से अभिप्रेरक है, भले ही मेरा दृढ़ विश्वास कि मुझे अपना हाथ वापस खींच लेना चाहिए, तार्किक निष्कर्ष के औपचारिक सिद्धांत का पालन नहीं करता। अगर व्यक्ति विश्व की वैज्ञानिक तस्वीर को गंभीरता से लेता है, तो यहाँ-और-अब या मैं के बारे में कुछ भी अस्तित्व की दृष्टि से विशेष या विशेषाधिकार प्राप्त नहीं है - अहंकारपूर्ण भ्रम स्वार्थी डीएनए द्वारा बनाई गई परिप्रेक्ष्य की चाल है। अगर मेरे लिए दर्द में रहना ग़लत है, तो फिर यह किसी के लिए भी, कहीं भी ग़लत है।

3: यह क्यों होगा

ठीक है, यह तकनीकी रूप संभव है। पीड़ा के बिना दुनिया अद्भुत होगी; और पूर्ण विकसित स्वर्ग-इंजीनियरिंग और भी बेहतर होगी। लेकिन फिर से, तो क्या? हज़ार-मीटर का चेडार पनीर का घन बनाना तकनीकी तौर पर संभव है। दर्द से मुक्त दुनिया क्यों होने वाली है? शायद यह सिर्फ इच्छापरक सोच है। शायद हम अनंत काल तक पीड़ा का जीव-विज्ञान बनाए रखना चुनेंगे2

यहाँ प्रति-तर्क यह है कि कोई उन्मूलनवादी परियोजना से सहानुभूति रखता हो या नहीं, हम डिज़ाइनर बच्चों की प्रजनन क्रांति की ओर बढ़ रहे हैं। भावी माता-पिता जल्दी ही अपने भविष्य के बच्चों की विशेषताओं का चयन करने लगेंगे। हम डार्विनवादी संक्रमण के बाद की पूर्व संध्या पर हैं, बात यह नहीं है कि चयन का दबाव कम गंभीर होगा, लेकिन विकास अब "अंधा" और "यादृच्छिक" नहीं रहेगा: अब चयन प्राकृतिक नहीं रहेगा बल्कि चयन अप्राकृतिक हो जाएगा। जीन-क्रम और जीन-स्वरूप के परिणामों की प्रत्याशा में, उनके संयोजन की डिज़ाइनिंग चुनकर हम अपने भविष्य के वंश की आनुवंशिक आसज्जा चुनेंगे। अधिक ख़राब जीन-क्रम और जीन-स्वरूप के संयोजनों के ख़िलाफ़ चयन का दबाव होगा जो पुश्तैनी वातावरण में अनुकूलनीय थे।

दुर्भाग्य से, यह कठोर तर्क नहीं है, लेकिन कल्पना करें कि आप अपने भविष्य के बच्चों के लिए मूड हेतु आनुवंशिक डायल स्वरूपण - सुख-विषयक सेट-बिंदु - का चयन कर रहे हैं। आप कौन-सी सेटिंग्स लेंगे? शायद आप आजीवन परमानंद की प्रवृत्तियाँ न चाहें, लेकिन माता-पिता की भारी संख्या निश्चित रूप से ख़ुश बच्चों का चयन करना चाहेगी। शुरुआत के लिए, उनका पालन-पोषण अधिक मज़ेदार होगा। अधिकांश संस्कृतियों में अधिकतर माता-पिता, और मैं सोचता हूँ कि ईमानदारी से, कहते हैं कि वे अपने बच्चों को ख़ुश देखना चाहते हैं। हम उन माता-पिताओं के प्रति संदेह कर सकते हैं जो यह कहते हैं कि अपने बच्चों के बारे में वे जिस बात की चिंता वे करते हैं, वह केवल ख़ुशी है - अनेक माता-पिता अत्यधिक महत्वाकांक्षी होते हैं। लेकिन अन्य बातें समान रहने पर, ख़ुशी सफलता का संकेत करती है जो संभवतः इस बात का अंतिम विकासवादी मूल है कि हम अपने बच्चों की और साथ ही अपनी खुद की ख़ुशी को महत्व क्यों देते हैं।

बेशक माता-पिता के चुनाव का तर्क निर्णायक नहीं है। इतना ही नहीं, यह स्पष्ट नहीं है क्रांतिकारी वार्धक्य-विरोधी प्रौद्योगिकियों द्वारा हमारे प्रजनन निर्णयों पर बलात उत्तरोत्तर संकीर्ण सामूहिक नियंत्रण लागू किए जाने तक हमारे सामने मुक्त प्रजनन पसंद की और कितनी पीढ़ियाँ होगी क्योंकि आयु-हीन अनश्वर-सम की बढ़ती आबादी परिमित भौतिक स्थान में अनिश्चित काल तक गुणित नहीं हो सकती। लेकिन प्रजनन निर्णयों पर केंद्रीकृत नियंत्रण का नियम बन जाने पर भी, और स्वयं प्रजनन विरल हो जाने पर, आदिम डार्विनवादी जीन-प्रकार के ख़िलाफ़ चयन का दबाव संभावित रूप से गहन रहेगा। इस प्रकार कल्पना करना मुश्किल है कि भविष्य की कौन-सी सामाजिक संरचनाएँ वास्तव में अवसाद-ग्रस्त या आशंकापूर्ण विकारों या यहाँ तक कि अप्रवर्धित चेतना की "सामान्य" विकृतियों - की कोई प्रवृत्ति पूर्व-नियोजित रचना की अनुमति देगी।

गैर-मानव पशु

अब तक मैंने बस एक प्रजाति में पीड़ा पर ध्यान केंद्रित किया है। उन्मूलनवादी परियोजना का यह प्रतिबंध संकीर्णता-वादी है; लेकिन हमारी एंथ्रोपोसेंट्रिक (मानव के ब्रह्मांड के केंद्र में होने की धारणा) पूर्वाग्रह की जड़ें गहरी है। अन्य प्रजातियों के सदस्यों के शिकार, हत्या, और शोषण ने पैतृक वातावरण में हमारे जीनों की समावेशी उपयुक्तता को बढ़ाया है। [यहाँ हम बोनोबोस से अधिक चिंपांजियों के सदृश हैं।] तो, उदाहरण के लिए, अगम्यागमन निषेध के विपरीत, हममें, उदाहरण के लिए, गैर-मानव जानवरों के शिकार और शोषण को ग़लत कहने की जन्मजात प्रवृत्ति नहीं है। हम पढ़ते हैं कि इरीन पीपरबर्ग के तोते, जिसके साथ हमने पिछली बार अनेक सौ लाख साल पहले, समान पूर्वज साझा किया था, की मानसिक उम्र तीन साल के बच्चे के समान थी। लेकिन फिर भी तथाकथित खिलाड़ियों के लिए मज़े के लिए पक्षियों को पर निशाना साधना क़ानूनी है। अगर खिलाड़ी मज़े के लिए अपनी खुद की प्रजातियों के शिशुओं और बच्चों को गोली मारते, तो उन्हें आपराधिक असामाजिक कहा जाता और जेल में डाल दिया जाता।

तो वहाँ व्यतिरेक है: समाचार मीडिया में मुख्य समाचार अकसर मानव शिशु के साथ दुर्व्यवहार और उपेक्षा, अपहृत बच्चे, या परित्यक्त रोमानियाई अनाथों का होता है। हमारी नफ़रत के सबसे बड़े आँकड़े उनके प्रति हैं, जो बाल-दुर्व्यवहार और बच्चों की हत्या के दोषी हैं। लेकिन फिर भी हम नेमी रूप से अन्य चैतन्य प्राणियों की बड़े पैमाने पर औद्योगिक हत्या के लिए भुगतान करते हैं, ताकि हम उन्हें खा सकें। हम मांस खाते हैं हालाँकि इस तथ्य के बेशुमार प्रमाण हैं कि जिन गैर-मानव पशुओं को हम कारख़ानों में उत्पन्न करते हैं और मार डालते हैं, उनकी कार्यात्मक, भावनात्मक, बौद्धिक और महत्वपूर्ण ढंग से, उनकी पीड़ित होने की क्षमता मानव शिशुओं और बच्चों के समान है।

धारणापरक ईश्वर की दृष्टि के परिप्रेक्ष्य से, मैं तर्क करूँगा कि नैतिक रूप से हमें कार्यात्मक रूप से समकक्ष गैर-मानव जानवरों के प्रति दुर्व्यवहार की उतनी ही चिंता करनी चाहिए जितनी कि हम अपनी खुद की प्रजातियों के सदस्यों की करते हैं - सूअर के प्रति दुर्व्यवहार और हत्या के प्रति भी वैसे ही, जैसे हम मानव शिशु के साथ दुर्व्यवहार या हत्या के प्रति करते हैं। यह हमारी मानवीय नैतिक सहज बुद्धि का उल्लंघन करता है; लेकिन हमारी नैतिक सहज बुद्धि पर सहज रूप से भरोसा नहीं किया जा सकता। वह हमारे एंथ्रोपोसेंट्रिक पूर्वाग्रह को प्रतिबिंबित करती है - न केवल नैतिक सीमा अपितु बौद्धिक और अवधारणात्मक सीमा को भी। ऐसा नहीं है कि मानव और गैर-मानव पशुओं के बीच कोई अंतर नहीं है, इससे अधिक नहीं कि अश्वेत लोगों और श्वेत लोगों, स्वतंत्र जन्में नागरिकों और ग़ुलामों, पुरुषों और महिलाओं, यहूदियों और गैर-यहूदियों, समलैंगिकों या विषमलैंगिकों के बीच कोई अंतर नहीं है। सवाल बल्कि यह है: क्या उनमें नैतिक रूप से प्रासंगिक अंतर हैं? इसका महत्व है क्योंकि जब हम चैतन्य प्राणियों के बीच वास्तविक लेकिन नैतिक रूप से अप्रासंगिक अंतर को पकड़ते हैं, तो नैतिक रूप से विनाशकारी परिणाम सामने आ सकते हैं। [स्मरण करें कि, उदाहरण के लिए, अरस्तू ने कैसे ग़ुलामी का समर्थन किया था। वह इतना अंधा कैसे हो सकता था?] हमारी नैतिक सहज बुद्धि आनुवंशिक आत्महित से विषाक्त है - उन्हें निष्पक्ष ईश्वर की दृष्टि का दृश्य लेने के लिए अभिकल्पित नहीं किया गया। लेकिन अधिक बुद्धि एकानुभूति के लिए अधिक संज्ञानात्मक क्षमता - और संभावित रूप से दया का विस्तारित दायरा - लाती है। शायद हमारी सर्वश्रेष्ठ बुद्धि/सर्वश्रेष्ठ एकानुभूति की प्रवृत्तियाँ गैर-मानव पशु-दुर्व्यवहार को उससे कम घृणित रूप में नहीं देखेंगी जितना हम बाल-दुर्व्यवहार को देखते हैं: भयानक आचारभ्रष्टता।

सही हो या नहीं, निश्चित रूप से हम एक दूसरे को खाना नहीं छोड़ेंगे? हमारा स्वार्थी पूर्वाग्रह बहुत अधिक मज़बूत है। हमें मांस का स्वाद बहुत ज़्यादा पसंद है। क्या वैश्विक शाकाहारवाद का विचार बस रामबाण का सपना नहीं है?
शायद ऐसा ही है। फिर भी कुछ दशकों के भीतर, आनुवंशिक रूप से तैयार किए गए पशु-खाद्य का यह मतलब है कि हम - बिना किसी हत्या और क्रूरता के - आज उपलब्ध किसी भी चीज़ की तुलना में अधिक स्वादिष्ट "मांस" खाने का आनंद ले सकते हैं। इसके पूर्व-स्वाद के रूप में कि भविष्य में क्या आने वाला है, जून 2007 में नॉर्वेजियाई जीव-विज्ञान विश्वविद्यालय में आयोजित एक कार्यशाला में इन विट्रो मांस कंसोर्टियम शुरू किया गया। महत्वपूर्ण रूप से, आनुवंशिक रूप से तैयार एकल कोशिकाओं से मांस उत्पन्न करना संभवतः अनिश्चित काल के लिए परिमाप्य होगा: अक्षुण्ण गैर-मानव जानवरों का उपयोग करने की तुलना में इसके वैश्विक मांस की खपत संभावित रूप से सस्ती है। इसलिएयह मानकर कि संभावित भविष्य के लिए हम नकदी संबंध और बाज़ार अर्थशास्त्र को बनाए रखते हैं - संभावना है कि सस्ता, स्वादिष्ट पशु-खाद्य हमारे साथी प्राणियों की कारख़ानों में उपज और सामूहिक-हत्या को स्थानापन्न कर देगा।

हमें संदेहपूर्ण आश्चर्य हो सकता है: क्या अधिकतर लोग वास्तव में रुचिकर पशु-खाद्य को खाएँगे, भले ही यह सस्ता और गैर-मानव पशुओं के वध से प्राप्त मांस से अधिक स्वादिष्ट हो?
अगर हम मान लें कि पशु-खाद्य का ठीक ढंग से विपणन होगा, तो हाँ। क्योंकि अगर हम यह पता लगाते हैं कि हम मृत पशुओं के लोथ की तुलना में पशु-वर्धित मांस का स्वाद पसंद करते हैं, तो क्रूरता-मुक्त आहार के लिए नैतिक तर्क शायद आज की तुलना में और ज़्यादा सम्मोहक लगेगा।

लेकिन फिर भी चाहे हम वैश्विक शाकाहारवाद का पालन करें, निश्चित रूप से फिर भी प्रकृति में भयानक क्रूरता होगी? वन्यजीव के वृत्तचित्र हमें जीव-जगत का बहुत बैमिफ़ाइड दृश्य दिखाते हैं: टीवी पर आधा घंटा यह देखते हुए बिताना अच्छा समय नहीं है कि गैर-मानव पशु प्यास या भूख से मर रहे हैं, या परभक्षी द्वारा धीरे-धीरे मारे और ज़िंदा खाए जा रहे हैं: और निश्चित रूप से एक खाद्य शृंखला होनी चाहिए? प्रकृति क्रूर है; लेकिन जनसंख्या विस्फोट और माल्थस की तबाही के दर्द पर परभक्षी हमेशा अनिवार्य होंगे?

ऐसा नहीं है। अगर हम चाहते हैं, तो बाकी प्राकृतिक दुनिया को भी पीड़ा से मुक्त करने के लिए हम डिपो गर्भ-निरोध3 प्रयोग कर सकते हैं, वैश्विक पारिस्थितिकी तंत्र को पुनः डिज़ाइन कर सकते हैं, और मेरु जीनोम को फिर से लिख सकते हैं। गैर-मानव जानवरों को मुक्ति की ज़रूरत नहीं है; उन्हें देखभाल की ज़रूरत है। देखभाल करना हमारा कर्तव्य है, ठीक वैसे ही जैसे हम मानव शिशुओं और बच्चों की, वृद्धों की, और मानसिक रूप से विकलांग लोगों की देखभाल करते हैं। यह दूर की संभावना लग सकती है; लेकिन वास-विनाश का अर्थ है कि इस शताब्दी के बाद में प्रकृति में जो प्रभावी रूप से बच रहेगा, वह हमारे वन्यजीव उद्यान होंगे। जैसे हम चिड़ियाघर में भयभीत जीवित कृंतकों को साँप को नहीं खिलाते हम मानते हैं कि यह बर्बर है क्या हम वास्तव में अपने क्षेत्रीय वन्यजीव उद्यानों में क्रूरता को अनुमति देना जारी रखेंगे, केवल इसलिए कि वे "प्राकृतिक" हैं?

पृथ्वी ग्रह पर अंतिम सीमा महासागर है। सहज बुद्धि से, यह बहुत जटिल कार्य प्रतीत हो सकता है। लेकिन कंप्यूटर शक्ति और नैनो-रोबोटिक प्रौद्योगिकियों की घातीय वृद्धि का अर्थ यह है कि हम सिद्धांत में समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र की भी पुनः रचना कर सकते हैं। फ़िलहाल ऐसी पुनः इंजीनियरिंग अभी भी नामुमकिन है; कुछ दशकों में, यह गणनापरक आधार पर संभव हो जाएगी, लेकिन चुनौतीपूर्ण होगी; अंततः, यह तकनीकी रूप से तुच्छ हो जाएगी। तो सवाल यह है: क्या हम वास्तव में यह करेंगे? क्या हम यह करें - या वैकल्पिक रूप से क्या हम डार्विनवादी यथास्थिति का संरक्षण करें? यहाँ हम स्पष्ट रूप से अटकलों के दायरे में हैं। लेकिन फिर भी हम उससे अपील कर सकते हैं, जिसे शायद कमज़ोर परोपकार का सिद्धांत कहा जा सकता है। इन विवादास्पद दावों से भिन्न कि सर्वश्रेष्ठ मेधा सर्वश्रेष्ठ एकानुभूति की माँग करती है, कमज़ोर परोपकार का सिद्धांत यह नहीं मानता कि प्रौद्योगिकी और संज्ञानात्मक रूप से उन्नत हमारे वंशज नैतिक रूप से उससे और अधिक उन्नत होंगे जितना हम अभी हैं।

आइए हम एक ठोस उदाहरण लेकर समझें कि यह सिद्धांत कैसे लागू होता है। अगर आज या तो मुक्त श्रेणी या कारख़ानों में तैयार अंडों की ख़रीद की पसंद पेश की जाए, जो अधिकतर उपभोक्ता मुक्त श्रेणी का चयन करेंगे। अगर बैटरी फ़ार्मिंग से उत्पन्न अंडे 50 पैसे सस्ते होंगे, तो भी ज़्यादातर लोग क्रूरता-मुक्त विकल्प ही चुनेंगे। नहीं, हमें मानव द्वेष, दुर्भावना और ख़ूनी मानसिकता को कम नहीं आँकना चाहिए; लेकिन हममें से अधिकतर लोगों में दया के प्रति कम-से-कम कमज़ोर पूर्वाग्रह अवश्य है। अगर आत्म-बलिदान का कोई गैर-नगण्य तत्व शामिल है, उदाहरण के लिए यदि मुक्त श्रेणी के अंडे का दाम 2 रुपए ज्यादा भी हो, तो दुख की बात है कि बिक्री तेज़ी से गिर जाएगी। मेरा कहना यह है कि अगर - और यह बड़ा अगर है नैतिक रूप से उदासीनता के लिए शामिल त्याग को अस्तित्वहीन या तुच्छ बना दिया जाए, तो उन्मूलनवादी परियोजना को जीव-जगत की अधिकतम सीमा तक ले जाया जा सकता है।

डेविड पीयर्स
(2007
तथा 1 व 2)

 


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